SHOWMANSHIP

कुछ हफ्ते पहले भारत ने आजादी के 75 साल पूरे होने का सेलिब्रेशन किया और ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के हिस्से के रूप में हमारे महान नायकों को याद करने के लिए कई  संगठनों द्वारा अभी भी विभिन्न गतिविधियां की जा रही हैं। हमारे इतिहास  में भारतीयो के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से होती है किन्तु  इस देश की जनता १८वी  सदी में भी अंग्रेजों के खिलाफ खड़ी थी। गुमनाम आदिवासी सेनानी तिलका मांझी ने 1784 में युद्ध का बिगुल बजाया और 1785 में उन्हें फाँसी दे दी गई।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में समाज के विभिन्न समुदाय जैसे किसानों, संतों, सशस्त्र बलों आदि का जिक्र है लेकिन भारतीय व्यापारिक समुदाय के योगदान को चर्चा में ज़्यादातर स्थान नहीं मिला है। आजादी की लड़ाई में योगदान देने के लिए देश के हर व्यक्ति  को तलवार हाथ में लेने की जरूरत नहीं है। भारतीय व्यापारिक समुदाय ने मशीनीकरण  की पहल उस समय की जब ब्रिटिश क्राउन भारतीय व्यापारियों के प्रति उदासीन और कभी-कभी शत्रुता से भरपूर था।भारत में कुछ औद्योगिक घरानों ने उस देश के औद्योगीकरण में अहम् भूमिका अदा की  है जो 20वीं सदी के मध्य तक महत्वपूर्ण  रूप से कृषि अर्थव्यवस्था थी। कई औद्योगिक घराने स्वतंत्रता-पूर्व से ही अस्तित्व में हैं, फिर भी कुछ ऐसे भी हैं जो स्वतंत्र भारत में उभरे और उन्होंने देश में औद्योगिक विकास की दिशा में प्रशंसनी भूमिका अदा  की है ।

देश की आजादी के बाद से हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था उतार-चढ़ाव से गुजर रही है। 1947 में, भारत एक खुली अर्थव्यवस्था थी परन्तु 1950 के दशक के मध्य तक, बड़ा व्यवसाय एक बुरा शब्द मन जाता था और जल्द ही सरकार ने बड़ी कंपनियों के विकास पर नियामक मर्यादा लगा दीं।सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ अर्थव्यवस्था के केंद्र में थीं। 1991 में आर्थिक नीति एक पूर्ण चक्र में बदल गई, जब पी वी नरसिम्हा राव सरकार ने सुधार शुरू किए और अर्थव्यवस्था को उदार बनाया। बड़े व्यवसाय और विदेशी पूंजी अब उपहास के बजाय इच्छा की वस्तु बन गए थे।इस पूरे बदलाव के दौरान, भारतीय अर्थव्यवस्था की एक विशेषता अपरिवर्तित रही है – परिवार के स्वामित्व वाले उद्यमों का प्रभुत्व। शीर्ष 20 व्यावसायिक समूहों में से पंद्रह परिवार के स्वामित्व वाले हैं।

Read More: Click Here

लेकिन, इस स्पष्ट यथास्थिति के तहत, एक बड़ा मंथन हुआ है। मुट्ठी भर को छोड़कर, अधिकांश परिवार-स्वामित्व वाले समूह हाशिए पर चले गए हैं। इसके विपरीत, आज के कई शीर्ष व्यावसायिक समूह या तो 1950 के दशक की शुरुआत में बहुत छोटे थे या स्वतंत्रता के बाद के आर्थिक विकास के उत्पाद हैं।

कुल मिलाकर, केवल तीन व्यावसायिक समूह जो 1951 में शीर्ष 20 में थे – टाटा, बिड़ला (एवी), और महिंद्रा – अभी भी लीग तालिका में हैं। और, बिड़ला के मामले में, केवल एक शाखा अपना प्रभुत्व बनाए रखने में कामयाब रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *